Monday, October 01, 2007

रुद्र हूँ मे

अस्तित्त्व मेरी कभी दब ना जाये
रुधिर मेरा कहीं रुक न जाये
तांडव नृत्य बिन भैरव न भाये
चाहे हिमालय हृदय थम जाये
रुद्र हूँ भोला जटा धार शिवशंकर हूँ

गंगा धोती कल्मष है
अविरत उसकी धारा
वो मेरी मुकुट मणि कि रानी है
असीम मेरी काया
काशी हृदय रामेश्वर मेरी छाया है

विष का अमृत होगया
विष कंठ मधुर मेरी वाणी से
काल कूट को ग्रहण किया
नए संसार का घटन किया
धरती का हर कन हूँ काल हूँ भारत हूँ
फिरभी भोला अत्यन्त हूँ मे ||

No comments: