Monday, April 16, 2007

कैसी होती जिंदगी?

ग़र मे नही होता तो कैसी होती जिंदगी ?

ऐसाही होता बहार ऐसी ही होती भर्खा
ऐसा ही होता सारा जहाँ
बस मे नही होता इस ज़िन्दगीके साथ

बस ऐसा ही चलता सफ़र दोस्तोंका
शायद ऐसा ही दौड़ता जहाँ जूजता
पर मई नही होता हम सफ़र जिन्दगिका

ऐसी ही होती सूरज कि रोशनी
ऐसी ही होती चाँद सितारोंकी चमक
बस मे नही पाता रोशनी जिंदगी kaa

ग़र मे नही होता तो कैसी होती जिंदगी?

मनोजव

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