कंबक्त वक्त नहि गुज़रता
हार जीत का ए हल नहि सुलझता
मुश्किले हैं या आसानि?
घडि कि सुयी सरक्ते
सोच हिचकिचाने लगती है
हाल कल का नहि समझ्ता
कंबक्त ये वक्त नहि गुज़रता ||
कल जियेंगे इन अनसुलझे खयलोंको
बांधेंगे कयी इमारतोंको
हल चल भेजेंगे कयि अखबारोंको
हांजी,बडप्पन्से गायेंगे अपने तरक्कियोंको
पर आज हर सपना केह्ता है
माफ़ करो यार, पर आज को निकल जाने दो
कलको मिलने के लिए आज
ऎ मगरूर वक्त के साथ दो घूंट पीते हैं,
और उसे मनाते है ||

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